ऐतिहासिक भव्यता और धार्मिक आस्था का केंद्र है भंवरा का इलाही माता मंदिर
ऐतिहासिक भव्यता और धार्मिक आस्था का केंद्र है भंवरा का इलाही माता मंदिर
दो अखंड ज्योतियों, प्राचीन शिवालय, बावड़ियों और पुरातात्विक अवशेषों के लिए प्रसिद्ध है गढ़ भंवरा


भंवरा (आष्टा)। सीहोर जिले की आष्टा तहसील का ग्राम भंवरा ऐतिहासिक, धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत को अपने भीतर समेटे हुए है। यहां स्थित मां भगवती दुर्गा का इलाही माता मंदिर श्रद्धालुओं की अटूट आस्था का प्रमुख केंद्र है। मान्यता है कि प्राचीन काल में इस स्थान को गढ़ भंवरा और माताजी का भंवरा कहा जाता था। आष्टा से लगभग 17 किलोमीटर दूर विंध्याचल पर्वत की तलहटी में स्थित यह धाम अपनी दो अखंड ज्योतियों के लिए विशेष पहचान रखता है।
2500 वर्ष प्राचीन होने की मान्यता
स्थानीय मान्यताओं और उपलब्ध पुरातात्विक विवरणों के अनुसार, मंदिर लगभग 2500 वर्ष पुराना माना जाता है। मंदिर के जीर्णोद्धार के दौरान मिले पाली भाषा के शिलालेख को इसकी ऐतिहासिकता से जोड़कर देखा जाता है। यह शिलालेख वर्तमान में सीहोर जिला संग्रहालय में सुरक्षित बताया जाता है। गांव और आसपास के क्षेत्रों में खुदाई के दौरान प्राचीन मूर्तियां, भवनों के अवशेष, बावड़ियां और अन्य पुरावशेष मिलने की बातें भी सामने आती रही हैं।
औरंगजेब से जुड़ी है लोकमान्यता
इलाही माता मंदिर को लेकर मान्यता प्रचलित है कि मुगल शासक औरंगजेब यहां आया था और माता की महिमा से प्रभावित होकर मंदिर को नुकसान पहुंचाए बिना लौट गया। इसी मान्यता के चलते मंदिर को इलाही माता के नाम से भी जाना जाता है। हालांकि, इस प्रसंग की ऐतिहासिक पुष्टि के लिए प्रमाणिक दस्तावेजों और पुरातात्विक साक्ष्यों का सत्यापन आवश्यक है।
दो अखंड ज्योतियां हैं विशेष पहचान
मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यहां वर्षों से प्रज्ज्वलित बताई जाने वाली दो अखंड ज्योतियां हैं। स्थानीय परंपरा के अनुसार, ये ज्योतियां करंज के तेल से जलती हैं, जिसे गांव में ही तैयार किया जाता है। मंदिर में नाथ संप्रदाय के पुजारी क्रमवार पूजा-अर्चना और ज्योतियों की सेवा करते हैं। दोनों नवरात्रों में नौ दिनों तक दुर्गा सप्तशती का पाठ, महाआरती और नवमी की रात्रि में हवन किया जाता है। चैत्र नवरात्रि के दौरान यहां विशेष महापूजन और पांच दिवसीय मेले का आयोजन भी होता है, जिसमें आसपास के गांवों सहित दूर-दराज से श्रद्धालु पहुंचते हैं।
प्राचीन शिवालय, बावड़ी और अन्य धरोहरें
मंदिर के समीप शिवालय, जलकुंड और प्राचीन बावड़ी स्थित हैं। स्थानीय विवरणों के अनुसार, बावड़ी में 100 से अधिक सीढ़ियां हैं और इसमें दो कुंड बने हुए हैं। गांव के अलग-अलग हिस्सों में छायन, सिलावट वाली, लखेरेवाली, फौजवाला और चौमुखा जैसे स्थानों को प्राचीन बसाहट से जोड़कर देखा जाता है। यहां से हिंदू और जैन धर्म से संबंधित प्रतिमाएं मिलने का उल्लेख भी मिलता है। गांव के जैन मंदिर में भगवान पार्श्वनाथ की स्फटिक प्रतिमा विराजित है।
विरासत के संरक्षण और विकास की जरूरत
भंवरा की एक विशेष पहचान यहां का सामाजिक समरसता का वातावरण भी है, जहां विभिन्न धर्मों और समुदायों के लोग साथ रहते हैं। धार्मिक महत्ता और ऐतिहासिक विरासत के बावजूद इस क्षेत्र को व्यापक पर्यटन पहचान दिलाने की आवश्यकता है। यदि प्रशासन, पुरातत्व विभाग और जनप्रतिनिधि यहां के प्राचीन स्थलों का सर्वेक्षण, ऐतिहासिक तथ्यों का दस्तावेजीकरण, धरोहरों का संरक्षण और बुनियादी सुविधाओं का विकास करें, तो इलाही माता मंदिर और गढ़ भंवरा धार्मिक पर्यटन के महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में उभर सकते हैं।