अंतिम संस्कार के लिए भी पैसे नहीं थे, आष्टा युवा संगठन ने संभाली जिम्मेदारी

अंतिम संस्कार के लिए भी पैसे नहीं थे, आष्टा युवा संगठन ने संभाली जिम्मेदारी

अंतिम संस्कार के लिए भी पैसे नहीं थे, आष्टा युवा संगठन ने संभाली जिम्मेदारी
40 वर्षीय महिला की मौत के बाद बेसहारा परिवार के सामने संकट, संगठन ने उठाया अंतिम संस्कार का पूरा खर्च और दिया एक माह का राशन
सवाल यह कि सरकारी योजनाओं और सामाजिक सुरक्षा के दावों के बीच ऐसे परिवारों तक मदद आखिर कब पहुंचेगी?
आष्टा। बीमारी के चलते इंद्रा कॉलोनी वार्ड क्रमांक 15 निवासी करीब 40 वर्षीय शोभा बाई नाथ का निधन हो गया। महिला की मौत से परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा, लेकिन इसके साथ ही एक और बड़ा संकट सामने खड़ा हो गया—परिवार के पास अंतिम संस्कार तक के लिए पर्याप्त पैसे नहीं थे।
आर्थिक रूप से बेहद कमजोर इस परिवार की स्थिति ऐसी है कि मृतका के पति रमेश नाथ के पैर में रॉड लगी हुई है, जिसके चलते वे नियमित मजदूरी करने में सक्षम नहीं हैं। वहीं उनका पुत्र शेखर नाथ अभी छोटा है। परिवार कच्चे मकान में रहता है और बरसात के दिनों में भी मुश्किलों का सामना करता है।
मौत के बाद भी पैसों का संकट, तब समाज बना सहारा
शोभा बाई के निधन के बाद जब परिवार अंतिम संस्कार की व्यवस्था करने में असमर्थ नजर आया, तब इसकी जानकारी आष्टा युवा संगठन के अध्यक्ष आनंद गोस्वामी को मिली। संगठन ने मामले को गंभीरता से लेते हुए तत्काल परिवार की मदद करने का निर्णय लिया।
आष्टा युवा संगठन ने शोभा बाई के अंतिम संस्कार का पूरा खर्च उठाया। इसके साथ ही परिवार को एक माह का आवश्यक राशन भी उपलब्ध कराया गया, ताकि इस कठिन समय में कम से कम भोजन की चिंता कुछ समय के लिए दूर हो सके।
एक परिवार की मजबूरी ने व्यवस्था पर खड़े किए सवाल
यह मामला केवल एक परिवार की आर्थिक मजबूरी की कहानी नहीं है, बल्कि यह सवाल भी खड़ा करता है कि सरकार की सामाजिक सुरक्षा और गरीब परिवारों के लिए संचालित योजनाओं का लाभ वास्तव में जरूरतमंद परिवारों तक कितनी जल्दी पहुंच रहा है?
जिस परिवार के पास अंतिम संस्कार के लिए भी पैसे नहीं हैं, उसके लिए सरकारी सहायता, सामाजिक सुरक्षा और स्थानीय प्रशासन की व्यवस्था कितनी प्रभावी है—यह सवाल जिम्मेदार अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के सामने भी खड़ा होता है।
जरूरतमंद परिवारों को सरकारी योजनाओं का लाभ दिलाने के लिए प्रशासन द्वारा समय-समय पर विभिन्न अभियान चलाए जाते हैं। इसके बावजूद यदि किसी परिवार को अपने परिजन के अंतिम संस्कार के लिए भी दूसरों की मदद का इंतजार करना पड़े, तो ऐसे मामलों में जमीनी स्तर पर योजनाओं की पहुंच और जरूरतमंदों की पहचान की व्यवस्था की समीक्षा जरूरी हो जाती है।
संकट की घड़ी में संगठन ने निभाया सामाजिक दायित्व
आष्टा युवा संगठन की इस पहल से परिवार को तत्काल राहत मिली है। अंतिम संस्कार से लेकर एक माह के राशन तक की व्यवस्था कर संगठन ने संकट की घड़ी में परिवार का साथ दिया।
लेकिन इस घटना ने एक बड़ा सवाल भी छोड़ दिया है—क्या जरूरतमंद परिवारों की मदद केवल सामाजिक संगठनों की जिम्मेदारी है, या शासन-प्रशासन को भी ऐसे परिवारों की पहचान कर उन्हें समय पर स्थायी सहायता उपलब्ध कराने की व्यवस्था करनी चाहिए?
शोभा बाई का परिवार आज भी आर्थिक संकट से जूझ रहा है। अंतिम संस्कार तो हो गया, लेकिन परिवार के सामने आगे की जिंदगी चलाने की चुनौती अब भी खड़ी है।

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