पार्क नहीं बचेंगे तो शहर की सांसें कैसे बचेंगी? कुर्सियां गायब, लोहे की छतरी और बच्चों के मनोरंजन के उपकरण भी नदारद; कचरे और अतिक्रमण ने बिगाड़ी पार्क की सूरत
आष्टा के तीन से अधिक पार्कों की बदहाली पर उठ रहे सवाल, आखिर सार्वजनिक स्थलों की सुध कौन लेगा?
आष्टा। शहर की पहचान केवल सड़कों, दुकानों और बढ़ते बाजार से नहीं होती, बल्कि शहर के बीच मौजूद वे छोटे-छोटे हरे-भरे स्थान भी उसकी खूबसूरती और जीवनशैली का हिस्सा होते हैं, जहां बच्चे खेलते हैं, बुजुर्ग कुछ पल सुकून से बैठते हैं और महिलाएं-पुरुष सुबह-शाम खुली हवा में समय बिताते हैं। लेकिन आष्टा में ऐसे ही सार्वजनिक पार्क धीरे-धीरे अपनी पहचान खोते नजर आ रहे हैं।
कृषि उपज मंडी के सामने कन्नौद रोड पर स्थित नगर पालिका के पार्क की वर्तमान स्थिति इस पूरे सवाल को सामने लाती है। कभी लोगों की चहल-पहल से गुलजार रहने वाला यह पार्क आज कचरे, अव्यवस्था, टूटे-फूटे सामान और अतिक्रमण की छाया में अपनी बदहाली की कहानी कह रहा है।
पार्क में लगी कई कुर्सियां अब नजर नहीं आतीं। लोहे की छतरी गायब है तो बच्चों के मनोरंजन के लिए लगाए गए कई लोहे के उपकरण या तो खराब पड़े हैं अथवा उनके गायब होने की स्थिति सामने आती है। सवाल यह है कि इन सार्वजनिक सुविधाओं की निगरानी और सुरक्षा की जिम्मेदारी आखिर किसकी है?
पौधे लगाए, फिर देखभाल कौन करेगा?
पार्क को सुंदर बनाने के लिए कभी पेड़-पौधे, हरियाली और क्यारियां विकसित की गई थीं। लेकिन देखरेख के अभाव में कई पौधे और पेड़ दीमक की चपेट में आकर जमीन पर गिर चुके हैं। दूसरी ओर पार्क के एक हिस्से में कचरे का ढेर इसकी साफ-सफाई व्यवस्था पर सवाल खड़ा कर रहा है।
सबसे गंभीर स्थिति पार्क के सामने दिखाई देती है, जहां अतिक्रमण के कारण टेंट-तंबू और अन्य गतिविधियों ने पार्क के सामने का खुला स्वरूप ही बदल दिया है। इससे पार्क की दृश्यता और सुंदरता प्रभावित हो रही है। साथ ही सवाल यह भी है कि ऐसी स्थिति असामाजिक गतिविधियों के लिए कितनी अनुकूल बन सकती है और इसकी जिम्मेदारी कौन तय करेगा?
जिस पार्क में बच्चे जिद करके आते थे, आज वही सूना क्यों है?
कभी यही पार्क बच्चों की पसंदीदा जगह हुआ करता था। छोटे बच्चे अपने माता-पिता से जिद कर यहां आने की मांग करते थे। बुजुर्ग घंटों बैठते थे और महिलाएं-पुरुष भी पार्क की हरियाली और खुली हवा का आनंद लेते थे।
आज स्थिति यह है कि लोग आते हैं और कुछ ही देर में वापस लौट जाते हैं। गंदगी, अव्यवस्था और सुविधाओं के अभाव के कारण पार्क में पहले जैसी रौनक दिखाई नहीं देती।
ऐसा लगता है मानो पार्क अपने उन पुराने दिनों को याद कर रहा हो, जब यहां बच्चों की आवाजें गूंजती थीं, बुजुर्गों की बातचीत होती थी और पेड़ों की छांव में लोग सुकून के कुछ पल बिताते थे।
क्या शहर में पार्कों की जगह धीरे-धीरे खत्म होती जाएगी?
यह सवाल केवल एक पार्क का नहीं है। शहर के तीन से अधिक पार्कों में इसी तरह की स्थिति होने की बात सामने आती रही है। कहीं हरियाली खत्म हो रही है, कहीं अतिक्रमण हावी है तो कहीं रखरखाव के अभाव में लाखों रुपये से तैयार की गई सार्वजनिक सुविधाएं धीरे-धीरे अपनी उपयोगिता खो रही हैं।
शहर का इतिहास भी यह सवाल पूछने को मजबूर करता है कि जब भी किसी सार्वजनिक स्थल की जमीन पर व्यावसायिक गतिविधियों का दबाव बढ़ा, क्या उसके संरक्षण के लिए उतनी ही मजबूती से आवाज उठी?
आज पार्क है, कल किसी दूसरे सार्वजनिक स्थल की बारी हो सकती है।
अगर शहर के पार्कों की जमीन और उनकी मूल उपयोगिता सुरक्षित नहीं रखी गई तो आने वाली पीढ़ियों के पास बच्चों को खेलने और बुजुर्गों को बैठने के लिए सुरक्षित सार्वजनिक स्थान आखिर बचेंगे कितने?
सबसे बड़ा सवाल—जिम्मेदार कौन?
नगरवासियों के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि पार्क में लगी कुर्सियां और लोहे के उपकरण यदि गायब हुए हैं तो उनकी निगरानी किसके जिम्मे थी? पेड़-पौधे सूख रहे हैं तो उनकी देखभाल कौन करेगा? कचरा पड़ा है तो सफाई कौन करवाएगा? और पार्क के सामने अतिक्रमण बढ़ रहा है तो उसे रोकने की जिम्मेदारी किसकी है?
सवाल यह भी है कि सार्वजनिक सुविधाओं के रखरखाव के लिए जिम्मेदार व्यवस्था अपनी जिम्मेदारी निभा रही है या नहीं?
नगर पालिका को चाहिए कि वह केवल नए विकास कार्यों की घोषणा तक सीमित न रहे, बल्कि पुराने पार्कों की स्थिति का भी भौतिक निरीक्षण कराए। गायब अथवा क्षतिग्रस्त सामान की जांच हो, सफाई व्यवस्था सुधारी जाए, पेड़-पौधों की देखभाल हो और अतिक्रमण की स्थिति की निष्पक्ष जांच कर आवश्यक कार्रवाई की जाए।
क्योंकि पार्क केवल जमीन का एक टुकड़ा नहीं होता। वह शहर की खुली सांस, बच्चों का खेल का मैदान, बुजुर्गों का सहारा और शहर की सुंदरता का हिस्सा होता है।
अब सवाल यह नहीं कि पार्क की हालत इतनी खराब कैसे हुई सवाल यह है कि इसे और खराब होने से बचाने के लिए जिम्मेदार व्यवस्था कब जागेगी?